नगरीय निकाय के निर्वाचन में उम्मीद से कम मतदान ने सिंगरौली के तमाम प्रत्याशियों व राजनीतिक विश्लेषकों के कान खड़े करते हुए उन्हे चौकन्ना कर दिया है। गत 6 जुलाई को सम्पन्न हुए नगरीय निकाय निर्वाचन के दौरान मतदान का चढते ग्राफ ग्राफ का अंतिम दौर में 52.56 प्रतिशत पर ठहर जाना चर्चा का हिस्सा बना हुआ है ।

जिसके तहत बाहरी – भीतरी के खेल का मतदान दिवस तक जारी रहने जैसे चौकाने वाले कई कारण उभर कर सामने आ रहे हैं। वैसे इसके पीछे कहीं तटस्थ बहुसंख्यक समाज की मतदान के प्रति उदासीनता को एक और कारण माना जा रहा है तो कहीं मतदाताओं तक मतदान पर्ची नहीं पहुंचाने हेतु निर्वाचन कार्य में लगे अमले को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।

विदित हो कि सिंगरौली जिले में 2 लाख 3 हजार 375 मतदाताओं में से 1 लाख 6 हजार 901 ही ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया है। यानि कि
सिंगरौली नगर निगम में मतदाताओं की आधी आबादी या तो वोटिंग करने निकले ही नही या फिर निकली भी तो बिना वोट डाले लौट आई। मतदान केन्द्र तक नही पहुंचने वालों ज्यादातर अगडा माना जाने वाला तबका है। जबकि पिछड़ा वर्ग बाहुल्य इलाकों के मतदान केंद्रों की स्थिति दूसरी हैं यहां औसत या फिर औसत से अधिक तक आंकड़ा पहुंचा है। निर्वाचन कार्यालय की अंतिम मतदान शीट भी यही साबित कर रही है।

नफा नुकसान की बात की जाए तो इस बार मतदान से दूरी बना कर चलने वाला तबका अमूमन बीजेपी का कैडर वोट रहा है। वैसे भी अभी तक के चुनावों से तो यही साबित होता आया है कि जहॉ वोटिंग का प्रतिशत घटा है वहां बीजेपी को घाटा ही हुआ है। और यदि इस चुनाव में भी ऐसा ही हुआ है तो बीजेपी को जबरदस्त नुकसान की आशंका बलबती है। जो बीएसपी और आप के लिए फायदे का सौदा हो सकता है।

पर्ची वितरण में हुई लापरवाही

सिंगरौली के राजनैतिक घटनाक्रम पर हमेशा
बारीक नजर रखने वाले समाज सेवी वृजेश शुक्ला की मानें तो इस बार के चुनाव की मतदाता सूची में भारी गड़बड़ी के साथ बहुत सारी विसंगतियां थी जिस कारण लगभग 20-25 प्रतिशत मतदाता मत डालने से वंचित रह गये।

समय पर मतदाता पर्ची न मिलने के कारण मतदाताओं को ना तो अपना नाम और मतदाता क्रमांक ही पता चल रहा था और ना ही मतदान केंद्र और कक्ष का। ऐसे में थक हार कर वह वापस लौट आए। हितेन्द्र सोनी के अनुसार इस लापरवाही को लेकर कहीं ना कहीं मतदाताओं में काफी नाराजगी है। यही कारण है कि मतदान का प्रतिशत कम रहा। इनके अनुसार मतदाता पर्ची वितरण का कार्य बीएलओ और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को सौपा गया था।

तटस्थ बहुसंख्यक मतदाता रहा उदासीन

जन चर्चा के अनुसार टिकट वितरण के दौरान से ही तटस्थ भूमिका अख्तियार कर चुके एक बहुसंख्यक समाज ने निर्णयाक भूमिका के बावजूद अपना मौनव्रत मतदान दिवस तक भी नहीं तोड़ा। ऐसे में मतदान के ग्राफ का गिरना पूर्व निर्धारित था। लोगों की माने तो टिकट वितरण के विरोध का तरीका इस वर्ग के अधिकांश लोगों ने” मत अपने दल पर नहीं तो कहीं नहीं” की राह पर चलते हुए वोटिंग का परित्याग से निकाला। चर्चा के दौरान यह भी तर्क दिया जाता रहा कि यदि भरोसा ना हो तो निर्वाचन कार्यालय द्वारा जारी अंतिम मतदान शीट को देख सकता है। जहां जहां इस वर्ग की अधिक संख्या है वहां वोटिंग कम हुई है की नहीं।

हावी रहा बाहरी – भीतरी फैक्टर

चूंकि नगर निगम सिंगरौली क्षेत्र की लगभग आधी आबादी एनसीएल व एनटीपीसी के दर्जनों आवासीय परिसरों में निवासरत है। जो दूसरे प्रदेशों व जिलों के होते हुए भी यहां के मतदाता भी है। लिहाजा बाहरी – भीतरी का फैक्टर मतदान दिवस तक जारी रहने के अनुमान को भी अतिशयोक्ति नहीं माना जा सकता। क्योंकि टिकट वितरण के दौरान यह मुद्दा बहुत ही जोर शोर से उठाया जाता है। आशंका जताई जा रही है कि सबक सिखाने की नियति से बाहरी वोटरों द्वारा मतदान से दूरी बना कर रखने की योजना को अंजाम तक पहुंचाया गया है।

इस फैक्टर का इससे बड़ा और क्या उदाहरण हो सकता है कि जहाँ 726 मतदाता संख्या वाले एनटीपीसी डीपीएस स्कूल के कक्ष क्रमांक दो मे मात्र 10. 74 प्रतिशत (78)ने मतदान किया जबकि स्थानीय निवासियों के हिर्रवाह के शा. उ. मा. वि. के मध्य भाग में बने कक्ष में 862 में से 796(92.34%) ने मतदान किया। कमोबेश इसी तरह का अंतर तमाम परियोजना क्षेत्रों एवं लोकल
मतदान केंद्रों के 240 मतदान केंद्रों पर भी है।

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