शिक्षा का अधिकार कानून की खुलेआम उड़ाई धज्जियां छात्र के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर मामले में पर्दा डालने का प्रयास

सिंगरौली: शिक्षा किसी भी व्यक्ति के लिए आवश्यक क्यों है यह शायद आज की स्थिति में किसी को बताने की जरूरत नहीं है शिक्षित समाज से एक बेहतर भविष्य की कल्पना की जा सकती है।किसी भी राष्ट्र की उन्नति में शिक्षा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, इसलिए भारत सरकार ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम को लागू किया, जिससे प्रत्येक बच्चे को सुलभ तरीके से शिक्षा प्राप्त हो सके |

शिक्षा का अधिकार अधिनियम वर्ष 2009 में बनाया गया जिसे अप्रैल 2010 से सम्पूर्ण भारत में लागू कर दिया गया | इस अधिनियम के अंतर्गत 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान की जाती है। परंतु देश में कानून बनने से ज्यादा यह कानून का पालन करने वालों से ज्यादा कानून तोड़ने वालों की संख्या में लगातार वृद्धि होती जा रही है सिंगरौली जिले के शिक्षा विभाग. education Department एवं निजी विद्यालय की मनमानी के कारण एक छात्र का भविष्य अंधकार में हो गया है

अब इस पूरे मामले के सामने आने के बाद से यहां विभागीय अधिकारियों ने मामले पर कुछ भी बोलना उचित नहीं समझा है तो वहीं प्राइवेट विद्यालय की जिम्मेदार अब गोलमोल जवाब देते नजर आ रहे हैं दर्शन पीड़ित ने पूरे मामले की शिकायत जिले के जिम्मेदार शिक्षा विभाग से भी कि अब जिम्मेदार विभाग मामले पर भोपाल पत्र भेजने की बात कर अपना पल्ला झाड़ने में लग गया है

जानें पूरा मामला

परिजनों का कहना है की शिक्षा के अधिकार के तहत उन्होंने 2017-18 में अपने बच्चे का एडमिशन सैपिएंट इंटरनेशनल स्कूल बिलौंजी वैढ़न में कराया था !उसके बाद बच्चा पांचवी तक वहाँ अध्ययन किया फिर अचानक से निजी विद्यालय के प्रिंसिपल ने परिजनों को नोटिस देते हुए बोला की हम आप के बच्चे को नहीं पढ़ा सकते है क्यों की विद्यालय को सरकार की तरफ से कोई भी शुल्क विद्यालय कोई नहीं दिया जा रहा है आप अपने बच्चे को फ़ीस जमा करके पढ़ाना पड़ेगा और बच्चे को स्कूल से भगा दिया गया ! अब ऐसे में अबोध बालक विद्यालय में जाकर घर बैठा है एवं परिजन अब सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं

निजी विद्यालय ने दिया फीस का हवाला Private school cited fees

संबंधित मामले को लेकर जब निजी विद्यालय के प्राचार्य से संपर्क किया गया तो पहले तो वह बात करने के लिए तैयार नहीं हुए एवं काफी मशक्कत के बाद उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए शुल्क का हवाला देते नजर आए ।

दरअसल सैपिएंट इंटरनेशनल स्कूल बिलौंजी के प्रिसिपल का कहना है की उनका शिक्षा के अधिकार के तहत हमारे विद्यालय में एडमिशन हुआ था लेकिन जब हम पोर्टल पे चेक करते है तो उनका सन राइज स्कूल वैढ़न में लिस्ट शो करता है हमने शिक्षा विभाग को आवेदन दिया है लेकिन अभी तक कोई कार्यवाही न हो पाने के कारण हम कुछ नहीं कर पा रहे है ! जैसे ही हमारे विद्यालय का नाम शो करने लगेगा हम बच्चे को बुला लेंगे

जिम्मेदार विभाग की फुले हाथ पैर 

जब मीडिया ने शिक्षा विभाग के अधिकारी आर. के. दुबे से बात करना चाहा तो उन्होंने पहले तो साफ तौर पर बात करने से ही मना करते रहे और कहा की हमने यहां से जानकारी भोपाल भेज दिया है

और जल्द ही बच्चे की जानकारी सही कर दी जाएगी ! ये विद्यालय वालो की गलती है जब उन्होंने एडमिशन लिया था बच्चे का तभी उनको बच्चे के जानकारी के साथ मैपिंग करा लेना था लेकिन उन्होंने नहीं कराया जिसके कारण ये सब प्रब्लम हुआ है जल्द ही भोपाल से सही कर दिया जायेगा हमारे हाथ में जितना था हमने कर दिया है !

संबंधित मामले पर विभागीय अधिकारियों सहित निजी विद्यालय की गलतियां स्पष्ट तौर पर दिखाई पड़ रही हैं परंतु अब न तो निजी विद्यालय की जिम्मेदार ही अपनी गलती स्वीकार कर रहे हैं और ना तो जिले का जिम्मेदार शिक्षा विभाग ही अपनी गलतियां मान रहा है इन सब के बीच एक विद्यार्थी का भविष्य जरूर अंधकार में आ गया है लगभग शिक्षण सत्र शुरू हो चुका है तो वहीं जिस बच्चे को विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए थी

अब विभागीय गलतियों का खामियाजा अब उस बच्चे को भुगतना पड़ रहा है विद्यालय ने साफ तौर पर उसे पढ़ाने से इनकार कर दिया है एवं को लेकर बातें तो जरूर कहीं जा रही हैं कि फीस के बाद से हम शिक्षण सत्र में छात्र को वापस बुला लेंगे परंतु सवाल तो यह उठता है कि इन सभी प्रक्रिया के बीच में अभी कितना वक्त लग सकता है यह कहा नहीं जा सकता ऐसे में छात्र का भविष्य अंधकार में जरूर दिख रहा है।

बड़ा सवाल यह है 

अब बच्चा क्या करे २ महीने से ना स्कूल जा रहा है और ना ही पढ़ाई कर पा रहा है इसका जिम्मेदार कौन ? आखिरकार सैपिएंट इंटरनेशनल स्कूल बिलौंजी के प्रिसिपल 1 कक्षा से 5 कक्षा तक बच्चे के परिजन से कोई बात क्यों नहीं किया या शिक्षा विभाग के जिम्मेदार व्यक्ति को कोई आवेदन क्यू नहीं दिया और अचानक से 6 क्लास में बच्चे को स्कूल से बाहर कर देना कितना उचित है जैसे पांच साल उन्होंने बच्चे को पढ़ाया उसी तरह जो परेशानी थी उसको सही भी कराते रहते और बच्चे को स्कूल भी आने दिया जाता लेकिन नहीं प्राइवेट स्कूल आज सिर्फ मनमानी करने पे उतारू हो चूका है !

 

शिक्षा का अधिकार अधिनियम के द्वारा सरकार को निर्देश दिए गए है, कि प्रत्येक बच्चे को उसके निवास क्षेत्र के एक किलोमीटर के अंदर प्राथमिक विद्यालय और तीन किलोमीटर के अन्दर माध्यमिक विद्यालय की सुविधा प्रदान करे | विद्यालय हेतु सरकार बजट का निर्माण करे और उसे प्रभावी ढंग से लागू करे |

निर्धारित दूरी पर विद्यालय न होने पर सरकार छात्रावास या वाहन की सुविधा प्रदान करे।किसी भी बच्चे को आवश्यक डॉक्यूमेंट की वजह से विद्यालय में प्रवेश देने से मना नहीं किया जा सकता है | प्रवेश के लिए किसी भी बच्चे को प्रवेश परीक्षा देने के लिए नहीं कहा जाएगा।

फीस वृद्धि कानून को लेकर शिक्षा निदेशालय ने जिला शिक्षा अधिकारियों को पत्र जारी कर दिया है। इससे पहले जारी आदेशों में कहा गया था कि कोई भी निजी स्कूल 10.13% से अधिक फीस नहीं बढ़ा सकते हैं। जितने भी प्राइवेट स्कूल हैं, उन्हें अब इन आदेशों के तहत ही कार्य करना होगा। कई शैक्षणिक संस्थान कैश से छात्रों की फीस लेते है जबकि कागजों में फीस कुछ और ही दर्शाई जाती है। ऐसे में कोई भी स्कूल फीस जमा करने की प्रक्रिया को खुली और पारदर्शी रखेगा।

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